प्रश्न कुंडली (होरारी ज्योतिष) किसी जातक के जन्म समय पर आधारित न होकर उस सटीक क्षण पर आधारित होती है जब कोई विशिष्ट प्रश्न ज्योतिषी के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। वैदिक ज्योतिष में काल को एक सचेतन सत्ता माना गया है। जिस समय किसी व्यक्ति के हृदय में कोई तीव्र जिज्ञासा या प्रश्न जाग्रत होता है, उस तात्कालिक क्षण की ग्रहीय स्थिति में उस प्रश्न का संपूर्ण उत्तर समाहित होता है। यह पद्धति उन स्थितियों में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है जब जातक का जन्म विवरण उपलब्ध न हो अथवा किसी त्वरित और विशिष्ट परिस्थिति का तात्कालिक निर्णय लेना हो।
ज्योतिषी प्रश्न कुंडली की गणना उस स्थान और समय के आधार पर करते हैं जब प्रश्न प्राप्त हुआ। इस कुंडली का लग्न जातक (प्रश्नकर्ता) का प्रतीक होता है, जबकि प्रश्न से संबंधित भाव उस विषय का प्रतिनिधित्व करता है। लग्नेश और कार्येश के पारस्परिक संबंध से ही अंतिम परिणाम सुनिश्चित होता है।
- लग्न भाव: प्रश्न पूछने वाले व्यक्ति, उसकी शारीरिक स्थिति और तात्कालिक मानसिक दशा का प्रतिनिधित्व करता है।
- चंद्रमा की स्थिति: प्रश्न के मूल कारण, जातक की गहरी चिंता और वास्तविक आंतरिक उद्देश्य को प्रकट करती है।
- दृष्टि संबंध: तीव्र गति वाले ग्रह का मंद गति वाले ग्रह की ओर अग्रसर होना भविष्य में कार्य सिद्धि का सूचक होता है।