| 1 |
धर्म-कर्माधिपति योग |
केंद्र-त्रिकोण |
नवमेश और दशमेश की शुभ भावों में युति, परस्पर दृष्टि या राशि परिवर्तन। |
बृहत पराशर होरा शास्त्र अध्याय 34 |
| 2 |
लग्नेश एवं पंचमेश संबंध |
केंद्र-त्रिकोण |
लग्नेश और पंचमेश की शुभ राशियों में युति या परस्पर दृष्टि। |
बृहत पराशर होरा शास्त्र अध्याय 34 |
| 3 |
लग्नेश एवं नवमेश संबंध |
केंद्र-त्रिकोण |
लग्नेश और नवमेश की युति, परस्पर दृष्टि या राशि परिवर्तन। |
बृहत पराशर होरा शास्त्र अध्याय 34 |
| 4 |
चतुर्थेश एवं पंचमेश राजयोग |
केंद्र-त्रिकोण |
चतुर्थेश और पंचमेश का केंद्र या त्रिकोण भावों में संबंध। |
बृहत पराशर होरा शास्त्र अध्याय 34 |
| 5 |
चतुर्थेश एवं नवमेश राजयोग |
केंद्र-त्रिकोण |
चतुर्थेश और नवमेश की शुभ भावों में युति या दृष्टि संबंध। |
बृहत पराशर होरा शास्त्र अध्याय 34 |
| 6 |
सप्तमेश एवं पंचमेश राजयोग |
केंद्र-त्रिकोण |
सप्तमेश और पंचमेश की युति या परस्पर दृष्टि संबंध। |
बृहत पराशर होरा शास्त्र अध्याय 34 |
| 7 |
सप्तमेश एवं नवमेश राजयोग |
केंद्र-त्रिकोण |
सप्तमेश और नवमेश की युति, राशि परिवर्तन या परस्पर दृष्टि। |
बृहत पराशर होरा शास्त्र अध्याय 34 |
| 8 |
दशमेश एवं पंचमेश राजयोग |
केंद्र-त्रिकोण |
दशमेश और पंचमेश का केंद्र या त्रिकोण भावों में संयोजन। |
बृहत पराशर होरा शास्त्र अध्याय 34 |
| 9 |
एकल योगकारक ग्रह राजयोग |
केंद्र-त्रिकोण |
एक ही ग्रह का केंद्र और त्रिकोण दोनों का स्वामी होकर शुभ स्थिति में होना। |
फलदीपिका अध्याय 6 |
| 10 |
रुचक महापुरुष योग |
पंच महापुरुष |
मंगल का केंद्र (1, 4, 7, 10) में मेष, वृश्चिक या मकर राशि में स्थित होना। |
सारावली अध्याय 35 |
| 11 |
भद्र महापुरुष योग |
पंच महापुरुष |
बुध का केंद्र (1, 4, 7, 10) में मिथुन या कन्या राशि में स्थित होना। |
सारावली अध्याय 35 |
| 12 |
हंस महापुरुष योग |
पंच महापुरुष |
गुरु का केंद्र (1, 4, 7, 10) में धनु, मीन या कर्क राशि में स्थित होना। |
सारावली अध्याय 35 |
| 13 |
मालव्य महापुरुष योग |
पंच महापुरुष |
शुक्र का केंद्र (1, 4, 7, 10) में वृषभ, तुला या मीन राशि में स्थित होना। |
सारावली अध्याय 35 |
| 14 |
शश महापुरुष योग |
पंच महापुरुष |
शनि का केंद्र (1, 4, 7, 10) में मकर, कुंभ या तुला राशि में स्थित होना। |
सारावली अध्याय 35 |
| 15 |
पंच-स्तरीय नीचभंग राजयोग |
नीचभंग |
नीच ग्रह का राशि स्वामी या उच्च राशि स्वामी लग्न या चंद्रमा से केंद्र में स्थित हो। |
बृहत पराशर होरा शास्त्र अध्याय 39 |
| 16 |
हर्ष विपरीत राजयोग |
विपरीत राजयोग |
षष्ठेश का 6ठे, 8वें या 12वें भाव में बिना अन्य क्रूर ग्रहों के प्रभाव के बैठना। |
उत्तर कालामृत अध्याय 4 |
| 17 |
सरल विपरीत राजयोग |
विपरीत राजयोग |
अष्टमेश का 6ठे, 8वें या 12वें भाव में स्वतंत्र रूप से स्थित होना। |
उत्तर कालामृत अध्याय 4 |
| 18 |
विमल विपरीत राजयोग |
विपरीत राजयोग |
द्वादशेश का 6ठे, 8वें या 12वें भाव में अन्य ग्रहों के बिना बैठना। |
उत्तर कालामृत अध्याय 4 |
| 19 |
राज्य पूजित योग |
राज पदवी |
सप्तमेश शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट होकर सप्तम भाव को सुदृढ़ करता हो। |
जातक पारिजात अध्याय 7 |
| 20 |
गजकेसरी योग |
राज पदवी |
चंद्रमा से केंद्र (1, 4, 7, 10) में बिना नीच स्थिति के गुरु का होना। |
बृहज्जातक अध्याय 13 |
| 21 |
अखंड साम्राज्य योग |
राज पदवी |
गुरु 2, 5 या 11वें भाव का स्वामी होकर चंद्रमा से केंद्र में हो और नवम/एकादशेश बलवान हों। |
जातक पारिजात अध्याय 7 |
| 22 |
अमला राजयोग |
राज पदवी |
लग्न या चंद्रमा से दशम भाव में नैसर्गिक शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र या बुध) का स्थित होना। |
बृहत पराशर होरा शास्त्र अध्याय 35 |
| 23 |
बुधादित्य योग |
राज पदवी |
सूर्य और बुध की शुभ भाव में कम से कम 3 अंश की दूरी के साथ युति। |
सारावली अध्याय 15 |
| 24 |
लक्ष्मी राजयोग |
राज पदवी |
नवमेश केंद्र या त्रिकोण में स्वराशि या उच्च राशि में हो और लग्नेश बलवान हो। |
बृहत पराशर होरा शास्त्र अध्याय 36 |