पारंपरिक पराशरी ज्योतिष में ग्रहों के स्थिर कारकत्व होते हैं जिन्हें नित्य कारक कहा जाता है। उदाहरण के लिए, सूर्य सदैव पिता और आत्मबल के कारक हैं, चंद्रमा मन और माता के कारक हैं, तथा शुक्र विवाह और वैवाहिक सुख के कारक माने जाते हैं। इसके विपरीत, महर्षि जैमिनी द्वारा प्रतिपादित जैमिनी ज्योतिष में चर कारकों की अवधारणा आती है, जहां प्रत्येक व्यक्ति की जन्म कुंडली में ग्रहों के भोगांशों (डिग्री) के आधार पर उनके कारकत्व बदलते रहते हैं।
आपकी कुंडली में जो ग्रह किसी राशि में सबसे अधिक अंश (डिग्री) पर स्थित होता है, वह आत्मकारक कहलाता है और वह कुंडली का सर्वोच्च मार्गदर्शक माना जाता है। दूसरा सर्वाधिक अंशों वाला ग्रह अमात्यकारक बनता है। ग्रहों के अंशों का यह घटता हुआ क्रम जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण क्षेत्र जैसे करियर, परिवार, माता-पिता, संतान, स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है। आत्मकारक व दाराकारक के विशेष मिलान हेतु हमारे आत्मकारक एवं दाराकारक कैलकुलेटर का उपयोग भी किया जा सकता है।
- परिवर्तनशील भूमिकाएं: जन्म समय और देशांतर के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में चर कारकों के ग्रह अलग-अलग होते हैं।
- अंशों का घटता क्रम: संबंधित राशि में 30 अंश से 0 अंश के क्रम में ग्रहों का स्थान निर्धारित किया जाता है।
- जन्म समय की सूक्ष्मता: कुछ ही मिनटों के अंतर से ग्रहों के क्रम और आत्मकारक में परिवर्तन आ सकता है।