वैदिक ज्योतिष में दिग्बल किसी ग्रह की वह दिशात्मक शक्ति है, जो आकाश मंडल और स्थानीय क्षितिज में उसकी स्थिति के आधार पर निर्धारित होती है। महर्षि पराशर द्वारा रचित बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अनुसार षड्बल (छह प्रकार के बल) में दिग्बल का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। यह बल दर्शाता है कि कोई ग्रह अपने नैसर्गिक गुणों को भौतिक जगत में कितनी सहजता और प्रभावशीलता से क्रियान्वित कर पाता है।
संस्कृत में दिक् का अर्थ दिशा होता है। जिस प्रकार मनुष्य की शारीरिक क्षमता और एकाग्रता उसके वातावरण व दिशा से प्रभावित होती है, उसी प्रकार ग्रह भी अपनी अनुकूल दिशा वाले केंद्र भाव में स्थित होकर उच्चतम सामर्थ्य प्राप्त करते हैं। पूर्ण दिग्बली ग्रह अपने कार्यक्षेत्र में न्यूनतम बाधाओं के साथ निश्चित सफलता प्रदान करता है।