वैदिक ज्योतिष (ज्योतिष शास्त्र) में पितृ दोष को किसी पूर्वज का श्राप नहीं, अपितु पितृ कुल और पूर्वजों के अधूरे संस्कारों एवं दायित्वों का कार्मिक संकेत माना गया है। पराशरीय सिद्धांत एवं लाल किताब परंपरा के अनुसार, जब जन्म पत्रिका में आत्मा और पिता के कारक सूर्य देव (पितृकारक), राहु, केतु अथवा नवम भाव (भाग्य एवं धर्म स्थान) पर क्रूर या पापी ग्रहों का अशुभ प्रभाव होता है, तब पितृ ऋण के लक्षण प्रकट होते हैं।
बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अनुसार पूर्वजों के अपूर्ण सत्कर्म या उपेक्षित दायित्व जातक की कुंडली में परिलक्षित होते हैं। पितृ दोष से प्रभावित जातक को कार्यों में अप्रत्याशित बाधाएं, निरंतर आर्थिक दबाव अथवा पारिवारिक अशांति का अनुभव हो सकता है, जिसका शमन शास्त्रों में वर्णित तर्पण, श्राद्ध और दान द्वारा सुगमता से हो जाता है।
वैदिक दर्शन में जन्म पत्रिका पूर्व जन्मों के संचित कर्मों का दर्पण है। कुंडली का नवम भाव पूर्व संचित पुण्यों और पितरों के आशीर्वाद का द्योतक है। जब इस भाव अथवा सूर्य देव पर शनि, राहु या केतु की युति या दृष्टि होती है, तो यह पूर्वजों के प्रति कर्तव्यों के निर्वहन का स्मरण कराता है।
अपनी जन्म पत्रिका में ग्रहों की स्थिति की विस्तृत जांच के लिए हमारा निःशुल्क जन्म कुंडली कैलकुलेटर देखें।