वैदिक खगोल विज्ञान (सिद्धांत ज्योतिष) में ग्रहों की वक्री गति को वक्र ग्रह कहा जाता है। वास्तव में कोई भी ग्रह सूर्य की अपनी कक्षा में पीछे की ओर नहीं चलता। वक्री गति केवल पृथ्वी से देखने पर प्रतीत होने वाला एक दृष्टि-भ्रम (आभासी गति) है, जो ग्रहों की अलग-अलग कक्षीय गति के कारण उत्पन्न होता है।
जब पृथ्वी किसी बाहरी ग्रह (मंगल, गुरु या शनि) को अपनी तेज आंतरिक कक्षा में पार करती है, अथवा जब कोई आंतरिक ग्रह (बुध या शुक्र) पृथ्वी को पीछे छोड़ता है, तो तारों की पृष्ठभूमि में ग्रह पीछे की ओर चलता हुआ दिखाई देता है। इस अवधि को ग्रह की वक्री स्थिति कहा जाता है।
खगोलीय दृष्टि से, वक्री गति के दौरान ग्रह पृथ्वी के निकटतम बिंदु (उपभू स्थिति) पर होता है। पृथ्वी और ग्रह के बीच की दूरी कम होने से उसका आकार और चमक बढ़ जाती है। शास्त्रीय ग्रंथों में इस स्थिति को दीप्त और अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।
सूर्य और चंद्रमा कभी वक्री नहीं होते क्योंकि पृथ्वी के सापेक्ष उनका मार्ग सदैव आगे बढ़ता है। राहु और केतु सदैव वक्री गति में रहते हैं क्योंकि वे पृथ्वी और चंद्रमा के कक्षीय संपात बिंदु हैं।