सूर्योदय व सूर्यास्त समय आज: सटीक वैदिक सूर्य समय | AstroLeaf
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सूर्योदय एवं सूर्यास्त कैलकुलेटर

विश्व के किसी भी स्थान के लिए स्थानीय सूर्योदय, सूर्यास्त, दिनमान, रात्रिमान, मध्याह्न, ब्रह्म मुहूर्त और राहु काल की सटीक गणना करें।

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नई दिल्ली, भारत के लिए सूर्योदय एवं सूर्यास्त

14 अक्टूबर 2026
वैदिक वार: --
समय क्षेत्र: UTC+5.5 निर्देशांक: 28.6139, 77.209
सूर्योदय

--:-- पूर्वाह्न

पूर्वी क्षितिज पर सूर्य का प्राकट्य
सूर्यास्त

--:--प्रधानमंत्री से --:--प्रधानमंत्री

पश्चिमी क्षितिज में सौर मंडल का अस्त
दिनमान (दिन की अवधि)

-- घंटे -- मिनट

मध्याह्न (सौर दोपहर): --:--
रात्रिमान (रात्रि की अवधि)

-- घंटे -- मिनट

सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक की अवधि
✦ वैदिक सौर मुहूर्त एवं संध्याएं
ब्रह्म मुहूर्त

--:-- AM से --:-- AM

उषाकाल की सात्विक बेला (सूर्योदय से 96 से 48 मिनट पूर्व)
प्रातः संध्या

--:-- AM से --:-- AM

प्रातःकाल (सूर्योदय से 48 मिनट पूर्व)
गोधूलि मुहूर्त

--:-- को --:-- --

सायंकालीन बेला (सूर्यास्त से 24 मिनट पूर्व व बाद)
सायं संध्या

--:-- को --:-- --

संध्या वंदन काल (सूर्यास्त के बाद 48 मिनट)
राहु काल (अशुभ काल)

0 सक्रिय योग

शुभ कार्य वर्जित। वार के अनुसार दिनमान का आठवां भाग राहु को समर्पित।
मासिक सौर पंचांग

मासिक सूर्योदय एवं सूर्यास्त सारणी

सभी समय स्थानीय नागरिक समय में प्रदर्शित
दिनांक वार सूर्योदय सूर्यास्त दिनमान राहु काल

1. वैदिक ज्योतिष में भगवान सूर्य एवं सूर्योदय का महत्व

वैदिक ज्योतिष में सूर्य देव को जगत की आत्मा और प्रत्यक्ष देवता माना गया है। आधुनिक पश्चिमी कैलेंडर के विपरीत, जहां दिन का आरंभ मध्यरात्रि 12:00 बजे से माना जाता है, सनातन वैदिक परंपरा में नए अहोरात्र (दिन-रात) का आरंभ स्थानीय सूर्योदय के ठीक उसी पल से होता है जब सूर्य का ऊपरी किनारा पूर्वी क्षितिज पर दृष्टिगोचर होता है।

पंचांग के पांचों अंग—तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण—सूर्योदय कालीन सूर्य स्थिति से ही निर्धारित होते हैं। इसके अलावा दैनिक होरा चक्र, चौघड़िया मुहूर्त और राहु काल की सही गणना भी स्थानीय सूर्योदय पर पूरी तरह निर्भर करती है। चूंकि पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के कारण दिनमान में निरंतर परिवर्तन होता रहता है, इसलिए अपने अक्षांश और देशांतर के आधार पर सेकंड-सटीक सूर्योदय व सूर्यास्त समय जानना अत्यंत आवश्यक है।

2. खगोलीय गणना एवं वायुमंडलीय अपवर्तन

खगोलीय दृष्टि से सूर्योदय वह क्षण है जब सौर मंडल का ऊपरी किनारा स्थानीय क्षितिज को स्पर्श करता है। पृथ्वी के वायुमंडल के कारण सूर्य की किरणें वायुमंडलीय अपवर्तन से ऊपर की ओर मुड़ जाती हैं, जो समुद्र तल पर लगभग 34 आर्कमिनट (0.5667 डिग्री) होता है।

इसके साथ सौर बिंब का अर्ध-व्यास (लगभग 16 आर्कमिनट या 0.2667 डिग्री) जुड़ने से जब हमें सूर्योदय दिखाई देता है, तब सूर्य का वास्तविक ज्यामितीय केंद्र क्षितिज से 50 आर्कमिनट (0.8333 डिग्री) नीचे होता है। हमारा यह कैलकुलेटर उच्च सटीकता के लिए 90.8333 डिग्री के खगोलीय आकाशीय कोण का उपयोग करके सेकंड-सटीक गणना प्रदान करता है।

3. दिनमान, रात्रिमान एवं 30 मुहूर्त विभाजन

वैदिक अहोरात्र को दो प्रमुख भागों में बांटा गया है: दिनमान (सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय) और रात्रिमान (सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक का समय)।

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार दिनमान को 15 समान मुहूर्तों में और रात्रिमान को भी 15 समान मुहूर्तों में विभाजित किया जाता है, जिससे कुल 30 मुहूर्त बनते हैं। विषुव के समय एक मुहूर्त औसतन 48 मिनट का होता है, परंतु ऋतु परिवर्तन के साथ इसकी अवधि घटती-बढ़ती रहती है। गर्मियों में दिन का मुहूर्त 55 मिनट से अधिक हो सकता है, जबकि रात्रि का मुहूर्त घटकर 41 मिनट तक रह जाता है।

4. ब्रह्म मुहूर्त एवं त्रिकाल संध्या का आध्यात्मिक महत्व

ब्रह्म मुहूर्त रात्रि का 14वां मुहूर्त होता है, जो स्थानीय सूर्योदय से ठीक दो मुहूर्त (लगभग 96 से 48 मिनट) पूर्व प्रारंभ होता है। आयुर्वेद और योग शास्त्रों के अनुसार इस उषाकाल में प्रकृति में शुद्ध सात्विक ऊर्जा का संचार होता है, जो ध्यान, प्राणायाम, मंत्र साधना और स्वाध्याय के लिए सर्वश्रेष्ठ समय माना जाता है।

दैनिक साधना में तीन मुख्य संध्याएं विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं:

  • प्रातः संध्या: सूर्योदय से 48 मिनट पूर्व का समय, जो गायत्री जप और सूर्य अर्घ्य के लिए समर्पित है।
  • मध्याह्न संध्या: सौर दोपहर का समय जब सूर्य आकाश के सर्वोच्च बिंदु पर होता है, जो आत्म-चिंतन और मध्याह्न वंदन का काल है।
  • सायं संध्या: सूर्यास्त के बाद 48 मिनट की अवधि, जो दीप प्रज्वलन, संध्या वंदन और ईश आराधना के लिए उपयुक्त है।

5. मुहूर्त शास्त्र में गोधूलि वेला की महिमा

गोधूलि मुहूर्त सूर्यास्त से लगभग 24 मिनट पूर्व से सूर्यास्त के 24 मिनट बाद तक रहता है। प्राचीन काल में संध्या समय जब गायें वन से चरकर लौटती थीं, तो उनके खुरों से उड़ने वाली पावन रज के कारण इस समय को गोधूलि कहा गया।

मुहूर्त शास्त्र में गोधूलि वेला को अत्यंत शुभ और दोषनाशक माना गया है। यह समय कई छोटे-मोटे पंचांग दोषों को स्वतः निष्प्रभावी कर देता है, जिससे यह विवाह संस्कार, गृह प्रवेश और यात्रा आरंभ के लिए विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।

6. राहु काल: दिन का त्याज्य एवं अशुभ अष्टमांश

राहु काल दिन का वह समय खंड है जिसका स्वामित्व छाया ग्रह राहु के पास होता है। दिनमान को 8 बराबर भागों में बांटा जाता है और सप्ताह के प्रत्येक वार के अनुसार एक भाग राहु को आबंटित होता है:

  • रविवार: आठवां भाग (सायंकाल सूर्यास्त से ठीक पहले)
  • सोमवार: दूसरा भाग (प्रातः काल)
  • मंगलवार: सातवां भाग (अपराह्न काल)
  • बुधवार: पांचवां भाग (मध्याह्न दोपहर)
  • गुरुवार: छठा भाग (दोपहर बाद)
  • शुक्रवार: चौथा भाग (पूर्वाह्न काल)
  • शनिवार: तीसरा भाग (प्रातः-पूर्वाह्न संधि)

चूंकि राहु काल दिनमान के अनुपात पर आधारित होता है, इसलिए घड़ी के तयशुदा समय (जैसे हर सोमवार 7:30 से 9:00 बजे मानना) पर निर्भर रहने से अशुद्धियां हो जाती हैं। हमारा कैलकुलेटर आपके स्थान के वास्तविक दिनमान के आधार पर सटीक राहु काल निर्धारित करता है।

7. सौर मध्याह्न एवं समय का समीकरण

सौर मध्याह्न वह क्षण है जब सूर्य आकाश में अपने उच्चतम बिंदु पर पहुंचकर स्थानीय याम्योत्तर को पार करता है। यह घड़ी के दोपहर 12:00 बजे से भिन्न होता है, जिसके दो मुख्य खगोलीय कारण हैं:

  • देशांतर अंतर: नागरिक समय मानक याम्योत्तर (जैसे भारत में 82.5° पूर्व) पर आधारित होता है। मानक रेखा से पूर्व या पश्चिम प्रत्येक डिग्री पर स्थानीय सौर दोपहर में 4 मिनट का अंतर आ जाता है।
  • समय समीकरण: पृथ्वी की कक्षा दीर्घवृत्ताकार होने और अक्षीय झुकाव के कारण वास्तविक सौर समय सामान्य घड़ी के समय से पूरे वर्ष में 16 मिनट तक आगे या पीछे हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

सूर्योदय, सूर्यास्त गणना और वैदिक दिनमान से जुड़े मुख्य प्रश्न एवं उत्तर।

यह कैलकुलेटर मानक सौर पंचांग एल्गोरिदम का उपयोग करता है जो 90.8333 डिग्री के सौर आंचल पर आधारित है। इसमें वायुमंडलीय अपवर्तन (34 आर्कमिनट) और सौर बिंब के अर्ध-व्यास (16 आर्कमिनट) को ध्यान में रखकर सेकंड-सटीक गणना की जाती है।

वैदिक ज्योतिष में नया दिन मध्यरात्रि से नहीं, बल्कि स्थानीय सूर्योदय से प्रारंभ होता है। सभी 30 मुहूर्त, दैनिक होरा, चौघड़िया और राहु काल की गणना स्थानीय सूर्योदय के आधार पर ही की जाती है।

सूर्योदय से सूर्यास्त तक की कुल समयावधि को दिनमान कहा जाता है, जबकि सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक की समयावधि को रात्रिमान कहते हैं। दोनों मिलकर 24 घंटे का अहोरात्र बनाते हैं।

ब्रह्म मुहूर्त रात्रि का 14वां मुहूर्त है, जो स्थानीय सूर्योदय से ठीक दो मुहूर्त (लगभग 96 से 48 मिनट पूर्व) होता है। इसे दिन का सबसे सात्विक और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण काल माना जाता है।

गोधूलि मुहूर्त सूर्यास्त से 24 मिनट पहले से 24 मिनट बाद तक रहता है। मुहूर्त शास्त्र में इसे अत्यंत कल्याणकारी और कई सामान्य पंचांग दोषों को दूर करने वाला माना गया है।

घड़ी का समय एक मानक समय क्षेत्र रेखा के अनुसार चलता है। सौर दोपहर वह क्षण है जब सूर्य आपके स्थानीय याम्योत्तर के ठीक ऊपर होता है। स्थानीय देशांतर और समय समीकरण के कारण यह घड़ी के 12 बजे से कुछ मिनट भिन्न होता है।

राहु काल दिनमान का आठवां भाग (1/8th) होता है। सप्ताह के प्रत्येक वार के अनुसार एक निश्चित अष्टमांश राहु को सौंपा गया है। ऋतु के अनुसार दिनमान बदलने पर राहु काल की अवधि भी घटती-बढ़ती है।

तीन संध्याएं हैं: प्रातः संध्या (सूर्योदय से 48 मिनट पूर्व), मध्याह्न संध्या (सौर दोपहर का समय), और सायं संध्या (सूर्यास्त के बाद 48 मिनट)।

जी हां, खोज बॉक्स में किसी भी शहर का चयन करते ही उसके अक्षांश-देशांतर और समय क्षेत्र के अनुसार पूरा सौर पंचांग तुरंत स्वतः पुनः परिकलित हो जाता है।

जी हां, मुख्य कार्ड के नीचे दी गई मासिक सौर पंचांग सारणी में चयनित महीने के सभी दिनों के लिए सूर्योदय, सूर्यास्त, दिनमान और राहु काल का विस्तृत विवरण उपलब्ध है।