वैदिक ज्योतिष में सूर्य देव को जगत की आत्मा और प्रत्यक्ष देवता माना गया है। आधुनिक पश्चिमी कैलेंडर के विपरीत, जहां दिन का आरंभ मध्यरात्रि 12:00 बजे से माना जाता है, सनातन वैदिक परंपरा में नए अहोरात्र (दिन-रात) का आरंभ स्थानीय सूर्योदय के ठीक उसी पल से होता है जब सूर्य का ऊपरी किनारा पूर्वी क्षितिज पर दृष्टिगोचर होता है।
पंचांग के पांचों अंग—तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण—सूर्योदय कालीन सूर्य स्थिति से ही निर्धारित होते हैं। इसके अलावा दैनिक होरा चक्र, चौघड़िया मुहूर्त और राहु काल की सही गणना भी स्थानीय सूर्योदय पर पूरी तरह निर्भर करती है। चूंकि पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के कारण दिनमान में निरंतर परिवर्तन होता रहता है, इसलिए अपने अक्षांश और देशांतर के आधार पर सेकंड-सटीक सूर्योदय व सूर्यास्त समय जानना अत्यंत आवश्यक है।