वैदिक ज्योतिष में महर्षि पराशर ने बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अंतर्गत अष्टकवर्ग पद्धति का प्रतिपादन किया। अष्टकवर्ग का शाब्दिक अर्थ है 'आठ गुना वर्ग या आठ स्रोतों से विभाजन'। इस गणना में जन्म कुंडली के सात प्रमुख ग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) और जन्म लग्न को आधार बनाकर प्रत्येक भाव और राशि की वास्तविक कार्यक्षमता और बल का संख्यात्मक मूल्यांकन किया जाता है।
सामान्य जन्म पत्रिका में ग्रहों की उच्च-नीच अवस्था अथवा दृष्टि संबंध केवल उनकी सैद्धांतिक स्थिति दर्शाते हैं, जबकि अष्टकवर्ग एक सटीक गणितीय अंक प्रणाली प्रदान करता है। अनुकूल व शुभ अंकों को बिंदु कहा जाता है, जबकि प्रतिकूल अंकों को रेखा कहा जाता है। इस प्रणाली के माध्यम से व्यक्ति स्पष्ट रूप से जान सकता है कि वर्तमान गोचर और विंशोत्तरी दशा उसके जीवन में किस समय श्रेष्ठ परिणाम देगी और किस समय सतर्कता आवश्यक है।