वैदिक ज्योतिष में जन्म कुंडली के सबसे शक्तिशाली ग्रह (प्रधान ग्रह) का निर्धारण केवल राशि या भाव स्थिति से नहीं होता, अपितु महर्षि पराशर द्वारा बृहत्पाराशर होराशास्त्र में प्रतिपादित षड्बल (छह प्रकार के बल) के सूक्ष्म गणितीय मूल्यांकन द्वारा किया जाता है। कुंडली के किसी शुभ भाव या मित्र राशि में बैठा ग्रह सदैव पूर्ण सामर्थ्य से कार्य करने में सक्षम नहीं होता, जब तक उसे दिशा, काल, चेष्टा और दृष्टि का अनुकूल समर्थन प्राप्त न हो। पराशरी पद्धति में ग्रह सामर्थ्य को विरूपा (60 विरूपा = 1 पूर्ण रूप) नामक शास्त्रीय इकाई में मापा जाता है, जिसके छह मुख्य अंग हैं:
- स्थान बल: राशि में ग्रह की उच्च स्थिति (उच्च बल), स्वराशि स्वामित्व (स्वस्थ बल), मूलत्रिकोण, मित्र राशि, D9 नवमांश कुंडली में स्थिति, विषम या सम राशि तथा द्रेष्काण विभागों से प्राप्त होने वाली शक्ति।
- दिग्बल (दिशात्मक बल): लग्न भाव के सापेक्ष चार मुख्य केंद्र भावों से अर्जित बल। पूर्व दिशा (प्रथम भाव) में देवगुरु बृहस्पति और बुध, उत्तर दिशा (चतुर्थ भाव) में चंद्रमा और शुक्र, पश्चिम दिशा (सप्तम भाव) में शनि और राहु तथा दक्षिण दिशा (दशम भाव) में सूर्य, मंगल और केतु पूर्ण दिग्बली होते हैं।
- काल बल: जन्म समय (दिन या रात्रि जन्म / नतोन्नत बल), चंद्र पक्ष (पक्ष बल), होरा व वार स्वामी, सौर संक्रांति अयन (अयन बल) तथा ग्रह युद्ध (युद्ध बल) से प्राप्त शक्ति।
- चेष्टा बल: ग्रह की दैनिक गति, मंद स्थिति और वक्रता (वक्री बल) से मिलने वाला सामर्थ्य। वक्री ग्रह चेष्टा बल में अत्यंत प्रखर माने जाते हैं।
- नैसर्गिक बल: ग्रहों का स्वाभाविक आंतरिक प्रकाश व सामर्थ्य। इसका प्राकृतिक शास्त्रीय क्रम सूर्य (60 विरूपा), चंद्रमा (51.4 विरूपा), शुक्र (42.8 विरूपा), गुरु (34.3 विरूपा), बुध (25.7 विरूपा), मंगल (17.1 विरूपा) और शनि (8.6 विरूपा) है।
- दृग्बल (दृष्टि बल): कुंडली में अन्य शुभ और क्रूर ग्रहों द्वारा डाली जाने वाली दृष्टियों का कुल सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव।